पुरानें क़िस्सों की नयी अर्ज़ियाँ

हार कौन मानता है।

यह कविता पुराने कुछ तारो को छेड़ देती है और शांत भी कर देती है। एक शुरूआत का अंत कर देती है और एक अंत की शुरूआत। आप पढ़िये और बताइये आपको एक अंत दिखता है या एक शुरूआत। 🙂

 

एक अरसे के बाद तुम मुझे इतना चाहिये नहीं थे
वरना हार कौन मानता है, जली हुई अाग बुझाने में

ये जो अफ़सोस भी हो रहा है, तो आज इसलिए
की एक मुद्दत बीत गयी, अपने अाप को समझाने में

अब जलना ही है तो ख़ुद ही जलेंगे
तकलीफ़ क्यों दे तुम्हें, अपने अहसास मिटाने में

अफ़सोस मेरे हालात पर, ज़ाहिर तो तुमने भी किया
पर बड़ी देर लग गयी शर्मिन्दगी जताने में

कही थी जो बात, वो ठीक ही थी
परवान चढ़ा था, मेरा परवाज़, एेसे ही उतरा

कुछ तुम्हारे अफ़सोस से, कुछ मेरे अंजाम से
ये प्यार का जूनून उतरा

इस तरह तुम जो माहताब थे
ज़र्रे में तब्दील हुए

इतना लम्बा रास्ता था
बड़ी घीरे घीरे ज़लील हुए

अौर छूटे भी तो मंज़िल पर आकर
जोश-ए-फरोशी में सफ़र निकल गया

होश आया बर्बादी के बाद
बेहोशी में शहर बदल गया

अब तो अफ़सोस भी एक मुद्दत ले रहा है आने में
थक गये है अल्फ़ाज़ तुम्हें समझने, समझाने में

वरना हार कौन मानता है, जली हुई अाग बुझाने में।

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दरमियाँ

आतिश

बहुत अरसे के बाद किसी की आरज़ू को अच्छे शब्द मिले है, यह कविता किसी ख़ास की नज़र है, पढ़ने वाले उन अहसासों को याद करे जो उन्हें किसी के क़रीब जाते हुए महसूस हुए हो।

हाँ, मगर याद रहे की यह वक़्त भी गुज़र जाएगा। 🙂

 

वो बोल रहा था
होले होले
धीरे धीरे
बातों की बारिश में उसकी
तारीफ़ों के झूले थे
पसीने से सने
मेरे बदन पर
दिखते उसको
मोती और हीरे थे
थकी आँखों की नमी में
शबनम के उसे दिखते जज़ीरे थे
वो यार था मेरा
या आतिश था
ख़ाक में उसको दिखते
फुलझड़ीयो के वज़ीफ़े थे
वो पढ़ पढ़ याद कर लेता
परसतिश के सब जो सलीक़े थे
मुक़द्दर के हवाले कर
ताबूत में डाल जो फेंके थे
अल्फ़ाज़ नहीं थे उसके
मेरे बिखरे हर्फ़ो के हरीफे थे
वो समेट कर लाया था जिसको
आरज़ू थी उसकी
और मेरे गए वक़्त के लतीफ़े थे
समझाए कोई उस दिल वाले को
की हर ख़ुशबू के रंग अब फीके थे
जो दिखती थी उसको मेलों सी
वो भीड़ नहीं थी
मुझ जैसे कई अकेले थे
कोई ख़ाक, कोई आतिश
दिल में लेकर
ढूँढ रहे उसी मोहब्बत के
नए नतीजे थे
क्यों ज़िन्दा करता है तू
अब ख़ाक से मुझको
तेरे अहसासों की ज़ंजीरों से
मैं फिर जल जाउंगी
तू चिंगारी है
बुझ जाएगा
मुझे जला कर
फिर इस आतिशबाज़ी में
ख़ाक होगी
एक और कहानी
तेरी साँस से मेरी रवानी
पर अब ज़िन्दा किया है
तो हाँ जी लेने दें
सुना है आग है तेरे लबों में
तौबा करते करते
अब थोड़ा सा पी लेने दे
एक कश लिया है तेरी रूह का
दम तो ज़रा भर लेने दे
तू ख़ाक तो कर
पर घीरे धीरे
जला कभी
कभी बुझ जाने दे
कभी रूठ जा तू भी मुझसे
मैं अब लूँगी तुझको मना
मौक़ा दे की
मैं भी जलते जलते
इस मदमस्ती में
रूक कर दूँ इस
चिंगारी को हवा।

पुरानें क़िस्सों की नयी अर्ज़ियाँ

पयाम

मुझसे टकरा कर निकल जाती है बातें
जो मेरे मज़नून की नहीं
परस्तिश करवाने का शौक़ नही मुझे
मेरे लिए तो जूनून ही सही
वो जो मेरी आँखों में तू हर सुबह भरता है
तेरा चेहरा मेरी क़यामत में सूकून करता है
तू कहता है की
इबादत मेरी हज़ार करते है
मैं भी कह देती हूँ
उन सब की आरज़ू हम नागवार करते है
वाक़या दर वाक़या क्या समझाऊँ
की तेरी मोहब्बत में
कितनों के दिल नासार करते है
तू कह दे कोई बात अपने लबों से
तो यह जिस्म और रूह
ख़ुद को फरमाबरदार करते है।
देख मशक़्क़त नही करना
जानने में मेरे दिल की रवानी को
तुम्हीं तक आ कर रुकेगी
अब यह कहानी तो
संभाले हुए रखा है मैनें ख़ुद को
कुछ और रोज़ तेरे इंतज़ार में
पर तू क़यामत क्यों ढाता है
इस अंदाज़े प्यार से
की लड़ जाती है मेरी तन्हाई
तुझसे ही
बिन तकरार के
मिलूँ तो कह देना जो बातें बाक़ी है
मेरे इंतज़ार में रूमानी ख़्वाहिशों की पाकी है
बेज़ार मत करना इन्हें किसी और के नाम से
दिल कई किताबें लिख देता है
तेरे एक एक पयाम से।

 

 

पुरानें क़िस्सों की नयी अर्ज़ियाँ

अफ़सोस

मेरे अफ़सोस के आँसू नायाब मोती है,
अब नहीं बहाऊँगा,
इनमें तेरी याद खोती है।

पलकों से हो कर बिखेरती है,
ये उस सन्नाटे को,
जहाँ चुप-चाप बेआवाज मेरी रूह रोती है,

आवाज़ इनके गिरने की,
फिर कोहराम मचा देती है,
जहाँ छुपाई तेरी हर आरज़ू होती है,

अब नहीं बहाऊँगा इन्हें,
ये दग़ाबाज़ होती है।

एक एक हर्फ़ को याद कर,
फिर तुझे जगाती है,
फिर सोती है,

अब नहीं सुनाऊँगा ये क़िस्सै अपने आप को,
इनमें तेरी आवाज़ होती है।

गूँज जाती है तू ,
अपनी सूनी आँखों के सपने ले कर,
ले,
मेरी पलके फिर बोझल होती है

तुझे याद करने से डर लगता है,
अब मेरी हिम्मत कायर होती है।

मेरे अफ़सोस के आँसू नायाब मोती है,
अब नहीं बहाऊँगा,
इनमें तेरी आस खोती है।

प्यार के फ़र्ज़ है कुछ,
उनको अब भी अदा करता हूँ,

ख़ुश हो जा की,
दुख में भी तेरे आज भी रोता हूँ,
ख़ुद से दगा करता हूँ।

मेरे अफ़सोस के आँसू नायाब मोती है,
बहाता हू क्योंकि,
इनमें तू दूर ही सही,
पर आस-पास होती है।

पुरानें क़िस्सों की नयी अर्ज़ियाँ

ग़लतफ़हमीयां

ये जो तुम मुड़ मुड़ कर देखते हो
ये बात अच्छी नहीं
ग़लतफ़हमीयां एेसे ही कामील होती हैं
तेरी आरज़ू की तरह
नज़र से फिसल कर मेरे दिल में शामिल होती हैं,

तुम चल कर आते भी नहीं
अौर बात कहाँ पूरी होती हैं
दिल की एक एक चोट पर
लिखी तेरी कोई मजबूरी होती हैं,

अक्स को अश्क़ कर देती हैं
जब भी इस नज़र को वाक़िफ़ होती हैं
ये तमन्ना तेरे मुड़ कर देखने की
खुदा कर तुझे, फिर काफ़िर होती हैं,

मिट जाते हो तुम ज़िन्दा होकर बार बार
दुआ में मेरे एक कसक सी शामिल होती हैं
बेवजह भूली बातें तेरी
फिर अपनी सी मालूम होती हैं,

ये जो तुम मुड़ मुड़ कर देखते हो
ये बात अच्छी नहीं
ग़लतफ़हमीयां जो कामील होती हैं
सच बोलें तो हर बार
सच सी मालूम होती हैं,

ये जो तुम मुड़ मुड़ कर देखते हो
ये बात अच्छी नहीं
ग़लतफ़हमीयां एेसे ही कामील होती हैं।

पुरानें क़िस्सों की नयी अर्ज़ियाँ

तुमने कब कहा था।

मैं जान दे दूँगा प्यार में
मैंने कब कहा था,

एक ख़ुशगवार अनकहा वादा था
जिसे कुछ तुमने, कुछ हमने सहा था।

अब जब थक गए हैं, तो चलो कुछ बात करते हैं
यूँ जान देने के वादों को फ़ख़त नासार करते हैं,

मर्ज़ एेसे क्यों पाले जिसके इलाज वक़्त के पास भी नहीं
छीन कर जान ले लेना, तेरे, या मेरे हाथ में नहीं।

मशरूफ हो जाते है एक दूसरे में
मगर देखो, थोड़ा अनजान बन कर,

जान नहीं लेंगे अब सुनो
एक दूसरे की जान बन कर।

तुम दूर मत होना, इस बार, फिर अहसास बन कर
और मैं भी नहीं चाहूँगा तुम्हें, प्यार की फरीयाद बन कर,

तुम जान दे दोगे प्यार में
तुमने कब कहा था,

एक ख़ुशगवार अनकहा वादा ही तो था
जिसे कुछ हमने, कुछ तुमने सहा था।

इस कविता का audio सुनने के लिए यहाँ click करे. आप निराश नही होंगे 🙂

https://meriawazmain.blogspot.in/2017/06/blog-post_85.html?m=1

https://inapoem.wordpress.com

 

दरमियाँ

मरहूम

क्या कहे मरहूम ने मर्ज़ ही कुछ इस तरह बताया था
चुप रहा नहीं
ना बोल पाया था

बस अर्ज़ करता रहता हर अपनी आज़माइश
पर ना तो धीरे से कहा
और न चिल्लाया था

लोग पूछते तो बोल पड़ता
अकेला छोड़ दो मुझे
इस बीमारी में उसे लगा इलाज आया था
मरहूम ने मर्ज़ ही कुछ इस तरह बताया था

आवाज़ नहीं
अल्फ़ाज़ नहीं
दिल नहीं
दिमाग़ नहीं
कुछ भी तो कहाँ बच पाया था
ऐसा उसने अपनी दवा से रिश्ता बनाया था
मरहूम ने मर्ज़ ही कुछ इस तरह बताया था

वो तो जब रुखसत हुआ दुनियाँ से
तब सच खुल कर सामने आया था
अरे कोई मर्ज़ नहीं था
दर्द रवा कर लिया था कमबख़्त ने

अरे कोई मर्ज़ नहीं था
शायरी को इलाज बनाया था

मरहूम ने मर्ज़ ही कुछ इस तरह बताया था
न तो खुल कर बोला
न चुप रह पाया था.