पुरानें क़िस्सों की नयी अर्ज़ियाँ

कोशिश (Effort)

अगर दिल ना मिले तो हर छोटी बात एक जद्दोजहद बन जाती है और अगर दिल मिले तो बड़ी से बड़ी बात रिश्तों को नाज़ुक करने के बजाए मज़बूत बना जाती है। कहते है की जो टूटे आसानी से उसे तोड़ना ही बेहतर है। सही या ग़लत पता नहीं पर समय तो बचेगा यह बात तय है। रिश्तों को बांधे रखने के लिए जान दे देना शिद्दत हो सकती है समझदारी नहीं, लेकिन जब तक यह बात समझ आती एक उम्र और कई रिश्ते गुज़र गए होते है, बेवजह लोगों के सामने शर्मिंदगी उठानी पड़ती है और जो ग़म मिलते है वो अलग।

 

ना जाने कितने फ़लसफ़े बना कर दफ़न कर दिए
कागजों को स्याही भी इमदाद ना हुई
मैं चुप ही रह ली फिर से
उसे लगा मैं बर्बाद ना हुई

तू नाम लिख कर मेरा मिटाएगा ना फिर
फिर उसने देखा कि मुझसे कोई ग़लती आज हुई
फिर मैंने उसे उसकी ख़ता नहीं बतायी
कुछ ऐसे यह बात हुई

मैंने अरमानो के सदके चढ़ाए
वो कहे अहसान मैं में उसकी हुई
मैं शाख़ कर दूँ यह वजूद
वो कहे की यह बात अब आम हुई

मेरा वास्ता ख़्वाबों से पड़ा
की मैं हक़ीक़त में नाकाम हुई
सब कुछ था आँखों के सामने
मोहब्बत में कहाँ कहाँ कैसे कैसे बदनाम हुई ।

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पुरानें क़िस्सों की नयी अर्ज़ियाँ

बचपन (Childhood Memoirs)

काफ़ी दिनो से कुछ पोस्ट नहीं किया..काम काज और कुछ अन्य चीज़ों में व्यस्त होना भी अच्छा रहा। कुछ अलग इक्स्पिरीयन्स मिले तो अलग दृष्टिकोण बने। इसलिए कुछ नया करते रहना आवश्यक है। कितना भी व्यस्त हो भावविभोर व्यक्ति भाव के समीप अपने आप को ज़रूर पाता है। अब फिर जब भाव बहे तो शब्दों ने असर दिखाया और कुछ लिख कर बाँटने का मन किया। तो ईद के मौक़े पर सब भाई बहनो से मिलने की ख़ुशी का असर यह कविता है।

सुनती है क्यारियाँ
गलियाँ गलियारे
जो बातें बिन बोले हो जाती थी
पड़ोस के काका की चूरन की गोलियाँ
जो हमने मिलकर बाँटी थी
वो साइकल के लिए लड़ना
और सड़कों पर खेलने की जो आज़ादी थी
वो पतंग उड़ाना
और पड़ौसी की छत पर कुदने
में जो तुम सब थे मेरे साथी
वो माँ बाप की लड़ाइयों में
हमारा हो जाना जज़्बाती
वो सब बातें मुझे याद है
वो जो बचपन के साथ है
जब रक्षा की थी एक दूसरे की
नही कोई मुश्किल हालात थे
आज सुनती हू सब अपनी लड़ाई से जूंझ रहे है
अपनी मंज़िल और रास्ता ढूँढ रहे है
में अपना पता बता रही हूँ
भूली नही हूँ उन गलीयो का रास्ता
जता रही हूँ
अकेले नही हो तुम सब
मंज़िलों की खोज में
मुझे रखना अपनी सोच में
और बाँट लेना हल्के भारी जज़्बात आपस में
मुझमें आज भी कही वो बच्चा है
जो तड़पेगा सुन कर तुम्हारी बात
और यह रिश्ते जो बदले थे
फिर से बदल जाएँगे
बचपन के साथ शायद तो नहीं पाएँगे
मगर जवानी के हालात बाँट पाएँगे । 😇

नये क़िस्सों की पुरानी तर्ज़

राज़ (Secrets of pain in desires)

बोलने से कुछ नहीं बदलता, बस सामने वाले को पता चलता है की आपको चोट कहाँ होती है। एक तरीक़ा यह होगा की हमें चोट हो ही ना, पर अभी तक मैं ऐसा अपने आप को ढाल नहीं पायी हूँ। पर किनारा करना सीख रही हूँ, ऐसी हर चीज़ से जो अहसास हल्के करने की बजाए भारी करे। हर कोई अपनी सोच का ग़ुलाम है शायद मैं भी, पर सोच में किसी को ना शामिल करना नहीं सीखा, ख़याल आ ही जाता है, उसके बाद फिर वही पुराने सिलसिले। इसलिए यह कविता की थोड़े से मगरूर हो जाए, सादगी और साफ़ दिल को बेवक़ूफ़ी और ज़रूरत का भी नाम देते हैं लोग।

मेरे सभी शायर और कवि दोस्तों, संभल कर रहिएगा दिल के मामलो में। गुड लक!

यह राज दिल के बताऊँ क्यूँ मैं
दाग़ ऐसे दिखाऊँ क्यूँ मैं
बहाल दिल को तू छोड़ देगा
ऐसे पिया के पास जाऊँ क्यूँ में

जो वसल पर बात की थी
भूल गया तू दोहराऊँ क्यूँ मैं
दिन अंधेरे गुज़र रहे है
रातों को शमा जलाऊँ क्यूँ मैं

मगरूर हो जा तू बात बात में
मेरी भी मालमत जताऊँ क्यूँ मैं
इल्म मेरे हाल का कौन रखे
मशवरत किसी से पाऊँ क्यूँ मैं

अपने रंज-ऐ-ग़म को क्यूँ मैं छोड़ो
किसी और के वाबस्ता इन्हें बनाऊँ क्यूँ मैं
हमदर्द हमराह हो तो मिलो
मुशीर इश्क़ के नाम घर लाऊँ क्यूँ मैं

मशरूफ है दुनिया के ग़म की ख़ातिर
दिए-तले-अंधेरा उन्हें दिखाऊँ क्यूँ मैं
लगाते है हर शमा पर चिंगारियाँ
बुझी लो को मेरी जलाऊँ क्यूँ मैं

मैं आम हूँ उसकी नज़र में
उन्हें ख़ास फिर पाऊँ क्यूँ मैं
मिले तो ले लें मेरे जैसी कुव्वत
फिर शर्मिंदा होने को किसी को जताऊँ क्यूँ मैं

यह राज दिल के बताऊँ क्यूँ मैं।

नये क़िस्सों की पुरानी तर्ज़

हुस्न के जलजले (The coming of beauty)

प्यार

जितना सदुपयोग या दुरुपयोग इस शब्द का हुआ है, उतना शायद किसी और शब्द का नहीं हुआ होगा। इससे प्यार, उससे प्यार, खुदसे प्यार, और जहाँ लगाव होगा वहाँ अलगाव भी होगा। सुनिए, प्यार केवल अपने आप में पूरक नहीं, अगर आप करना चाहते है तो करिए, जैसी आपकी शिद्दत हो वैसी करिए, पर फिर भूल जायिए। जो शिद्दत आपने महसूस की वो आपके दिमाग़ में थी, वैसी ही वापस ना मिले, तो जो मिले उसे महसूस करिए, ना हो महसूस अगर तो अपनी राह बदलए पर अफ़सोस ना करिए ना ही अहसासों को दबाइये। दिल खोल कर ज़िन्दगी बितायें।
जब तक आपका दिल टूटना बंद ना हो जाए समझ लीजिए की तब तक अच्छे से टूटा नहीं है 😉

यह शायरी ऐसे ही लोगों की नज़र है….

उसने हुस्न के जलजले
शब-ए-तारुफ में एैसे घोल दिए
की अागाज-ए-सुबह मेरी
फरमाबरदार हो गयी

उलझन दिलो की होती होगी उन्हें
जो पलके झपकते है
मेरी तो आँखें खुली रह गयी
और वो नज़र के पार हो गयी

काँटू तो लहू भी नही निकलता
रगो में मेरे वो खुमार हो गयी
ख़ून तो तारीफ़ों में बह गया
उसकी सुर्ख़ लाली शर्मसार हो गयी

अच्छी नही लगती उसकी आँखों में शरम
उसे बीमारी थी परायो में मेरा शुमार करने की
मैं तो दिल चीर कर बैठा था और
हिचकिचाने ही में उसे मोहब्बत बेशुमार हो गयी

दामन खींच लिया मैंने भी उसका
एैसे वो मेरी बाँहों में खो गयी
अब कैसे आएगी शरम
हमजिस्म हमारी जान हो गयी

१०० दिन का फ़ासला एक दिन की दूरी हो गयी
यह हरकतें अब कितनी ज़रूरी हो गयी
मैं मोहब्बत को सोचने का वक़्त नही देता
जाने कितनों की सोच में ये अधूरी खो गयी

मेरे ख़ुमार में उसकी सुबह होती है आज कल
और परसों मिलने की मंज़ूरी हो गयी
लोग जल रहे है अब मुझे देख कर
नज़र में उसकी मेरी शख़्सियत पूरी हो गयी

बताओ उन्हें जो प्यार से डरते है
दिल टूटना कब से कमज़ोरी हो गयी
मैं तो घोल कर पी गया हूँ आशीकी
मिले तो जहेनसीब,
न मिले तो किसी की मजबूरी हो गयी।

दरमियाँ

बोरियत (Boredom)

बोरियत सभी को होती है, किसी को ज़्यादा किसी को कम। किसी को ख़ाली समय में, किसी को हर वक़्त, किसी को किसी की याद में, किसी को किसी को भूलने की आस में, लोग अलग अलग तरीक़े निकाल ही लेते है अपनी बोरियत को हटाने के। आपने नोटिस किया होगा की कैसे दिल भटकता है जब दिल और दिमाग़ पर कोई और छाया हो, इसे बीमारी कहा जा सकता है क्यूँकि जब होश आता है तो विश्वास नहीं होता की हम कैसे बन गए थे किसी और के लिए जैसे कोई मच्छर काट कर बीमार कर देता है तो ज़रूरी है कि अगर दिल तुड़वाने की हिस्ट्री है तो अपना दिल बचा कर रखिए, व्यस्त रहिए, बार बार दिल तुड़वाने में कोई बहादुरी नहीं । बस हिम्मत टूटतीं है, यह हिम्मत जो आप दिल के मामलों में दिखाते है उसे आस पास रोज़मर्रा की ज़िंदगी में दिखाए, पढ़े, लिखे, कुछ अच्छा करे जहाँ भी आप हो जैसी भी आपकी ज़िंदगी हो।

यह कविता मेरे ऐसे ही किसी ख़ाली पल का नतीजा है 😌

हल्की सी बोरियत है
और काम भी बहुत है
निबटाने तो है पर
बेपरवाही में आराम बहुत है

आज कल पुराने मसले परेशान नहीं करते
लोग भी अब उतना हैरान नहीं करते
लगता है वक़्त हो गया
गए अहसास मुझसे अपनी पहचान नहीं करते

ताला लगा कर सुबह फिर चेक किया तसल्ली के लिए
की बहादुरी क़ैद से ना निकल जाए
रोज़ जज़्बात गिनता हूँ की पूरे तो है मेरे पास
यह दिल बड़ी मुश्किल से बुज़दिल हुआ था

नफ़स क़ाबू में है
तो बे रूत दिल डोलता भी नहीं
साये तो मँडराते है अब भी
मैं दरवाज़ा खोलता नहीं

चलो एक कहानी तो ख़त्म हुई
खुदसे ये बेईमानी सी खतम हुई
की लोग मिले थे मुझे
कोई कहाँ मिलता है किसी और को
हर कोई अपनी ही खिड़कियों से टकरा रहा है

मिला तो बस खुदका दिल
इसके जैसा ना कोई नाज़ुक मिला ना मज़बूत
हल्की सी बोरियत तो है
यह गुज़रे न गुज़रे
दिन गुज़रेगा ज़रूर।

दरमियाँ

कुछ बचा हुआ (something left behind)

कुरेदोगे ज़ख़्मों को तो आह तो निकलेगी ही
बची हुइ बातों में कुछ चाह तो निकलेगी ही

हर अहसास बँधा हुआ है तेरी आरज़ू से
जीने में इन्हें फ़रियाद तो निकलेगी ही

ज़िक्र न भी करूँ तेरा तो क्या
अहसासों की रवानी बेज़ुबानी निकलेगी ही

नयी कैसे कर दूँ पूरानी ज़िन्दगी को
भूली बिसरी तेरी कहानी तो निकलेगी ही

बदन के फ़र्श पर एक दाग भी नहीं
पर कोई भी छुए तेरी याद तो निकलेगी ही

अफ़सानों में मेरे क़िस्सा कोई भी हो
तेरी बात तो निकलेगी ही

रूखसत होने को वक़्त नही आया इस दुनिया से
इसीलिए यह शाम भी निकलेगी ही

ज़िन्दा तो में रह लूँगा तिनके की नोक पर
इस चुभन में मेरी जान तो निकलेगी ही।

दरमियाँ

अनपढ़ दिल

कई बार सुनती हूँ की यह उससे नाराज़ है, वो उससे, वगेरह वगेरह। अकेले मे पूछों तो सभी बस कुछ चाहते है एक दूसरे से, उसी के चलते सारे गिले शिकवे होते रहते है। काश सभी थोड़ा वक़्त ले कर एक दूसरे को समझें तो कितनी आसान हो जाएँगी रोज़मर्रा की ज़िंदगी। यही भावना ज़ाहिर करने की कोशिश की है इस कविता मैं।

दिल के टुकड़े क़ाफ़िलो में बह रहे है
हम तुमसे रूठे है
सब एक दूसरे से कह रहे है
ये फ़रमान चढ़ा दो ख़ैरखवाहो की नज़र
की ख़ैर में अपनी
सभी सबको जालीम कह रहे है

आऔ पहले ज़ुबान-ए-बयान को
मुनासिब करे
अपनी सोच रहनुमा
और ज़ुबान को आकिब करे
फिर फ़लसफ़े तो अपने आप बदल जाएँगे
अफ़साने मंजिलो को छोड़ रास्तों पर आएँगे
जब नज़र नज़राने नही ढूँढेगी
तभी तो ताल्लुक़ के बहाने नहीं होंगे
रिश्ते बनेंगे रिश्तों की ख़ातिर
साथ में दो अनजाने नही होंगे
और राहगीर रुसवा नही होंगे
अरमानों के दलदल में
एक दूसरे को पास खींच खींच कर
सब कोई तन्हा नहीं होंगे
फ़लसफ़े बनाने में मिट नही जाएँगे
और फसाने अफ़सोस में नही बह जाएँगे
ये तन्हाई के आलम महफ़िल में नही होंगे
दिल में मोम लिए सब संगदिल नहीं होंगे

अपने आप को दूसरों में भी हम पाएँगे
इन बिखरे टुकड़ों से सभी, कई नये दिल बनाएँगे।