दरमियाँ

Poetry book out! “Lafzo ke darmiyaan” 🙏🙏

हेलो,

मुझे बहुत ज़्यादा ख़ुशी हो रही आप सबको बताते हुए की मेरी पहली कविता की किताब अब प्रिंट हो कर आ गयी है। अब तक इस ब्लॉग पर लिख कर ख़ुशियाँ हासिल की। आप सबकी लाइक से मेरा दिन बन जाता था। मैंने सोचा नहीं था कि मैं ऐसा दिन देखूँगी पर God was kind! और मेरी किताब आ गयी।

पता नहीं की कौन पढ़ेगा कौन नहीं पर अपनी कल्पना को किताब के रूप में देख कर बहुत अच्छा लगा इसलिए आप सब से यह बाँटने का मन किया। किताब का कवर भी मैंने ही बनाया है, आप इस पर मेरा नाम भी देखेंगे। 🤗 इसका प्रकाशन @राजमंगलप्रकाशन ने किया।

मेरी किताब amazon पर उपलब्ध है। प्लीज़ आप उसे पढ़े और ज़रूर बताए कि आपको कैसी लगी। प्रोत्साहन देने को कम लोग होते है और ग़लतियाँ निकालने वाले ज़्यादा, पर यहाँ मुझे हमेशा प्रोत्साहन ही मिला है। आपका आभार।

Link: https://www.amazon.in/Lafzon-Darmiyaan-Hindi-Shabnum-Khanum-ebook/dp/B08CF5CSN9/ref=nodl_

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Dawat – e – Dil, Hindi poetry, Romantic poetry

Dawat e Dil hai tu mashuk, aaj kaunsa jajbaat lau?

दिल की महफ़िल में रोज़ ही पेशकश होती है और रोज़ ही जज़्बातों के क़ाफ़िले निकलते है, ऐसे में इन ऊपर नीची होती हुई बातों का मज़ा लेने में ही बेहतरी है। यही बात इस नज़्म में कही गयी है। आइए सुनिए___

 

अगर आपको पसंद आए तो ज़रूर सब्स्क्राइब करे मेरे चैनल को, शेयर करे ऐसे किसी इंसान से जो इसका मज़ा ले पाए, कोशिश तो यही है की बेहतर से बेहतर नज़्म आप तक पहुँचे।

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Dil tera yeh naam kisne rakha, New audio poetry

दिल तेरा यह नाम किसने रखा, तेरा कोई लेना देना नहीं किसी काम से, तुझे यूँ सरेआम किसने रखा !

कुछ ऐसी ही बात इस कविता में कहने की कोशिश की है मैंने। सुनिए आप भी 🙂

 

 

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मैं बोलता बहुत हूँ – Video shayri

मैं बोलती तो हूँ बहुत ये सच है। बात करने से अच्छा लगता है, तकलीफ़ें कम होती है और ये पता चलता है की सबको कुछ ना कुछ परेशानी है। सब ही मुश्किलों से लड़ रहे है।

बात करने वालों के बारे में एक बात जो याद रखनी ज़रूरी है की अगर कोई बात बात में कुछ बोल दे तो उसे दिल से लगाना नहीं चाहिए।

ऐसा ही कुछ इस कविता में बताने की कोशिश की है।
अगर आपको पसंद आए तो youtube channel को subscribe करे और share करे ❤️ और हाँ मुझे feedback ज़रूर दे प्लीज़।

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Dosto

दोस्तों आज ज़हन में एक ख़याल आया। आप सभी से यहाँ wordpress पर बात होती रहती है, पर आज कल मैं insta पर ज़्यादा ऐक्टिव हूँ। अगर आप में से कोई वहाँ ऐक्टिव है और लिखते भी है वहाँ तो मैं ज़रूर आपसे जुड़ना चाहूँगी insta पर।

मेरा नाम insta पर है shabnumk, handle @nuqta.khadipai.fullstop

मिलते है वहाँ कुछ और लिखने पढ़ने को

अपना ध्यान रखिए

शबनम

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Mausam (मौसम)

गुजरने को वक्त और इंसान दोनो ही समय के साथ बीत जाते है। कुछ को हम छोड़ देते है व्यवहार या हालत की नज़र हो कर और कुछ हमें। कौन सही था कौन ग़लत था इसी में ज़िंदगी गुजर जाती है।

इस बार नए तरीक़े से कविता को दिखाने की कोशिश की, पुराने पिक्चर्स थे सभी घर वालों के, उनका यूज़ करने में बहुत मज़ा आया। एक लम्बा गैप आ गया था blogging पर, वो भी खतम किया। बताएगा आपको पिक्चर्स कैसे लगे।

Insta @shabnum_khanum

पुरानें क़िस्सों की नयी अर्ज़ियाँ

कोशिश (Effort)

अगर दिल ना मिले तो हर छोटी बात एक जद्दोजहद बन जाती है और अगर दिल मिले तो बड़ी से बड़ी बात रिश्तों को नाज़ुक करने के बजाए मज़बूत बना जाती है। कहते है की जो टूटे आसानी से उसे तोड़ना ही बेहतर है। सही या ग़लत पता नहीं पर समय तो बचेगा यह बात तय है। रिश्तों को बांधे रखने के लिए जान दे देना शिद्दत हो सकती है समझदारी नहीं, लेकिन जब तक यह बात समझ आती एक उम्र और कई रिश्ते गुज़र गए होते है, बेवजह लोगों के सामने शर्मिंदगी उठानी पड़ती है और जो ग़म मिलते है वो अलग।

 

ना जाने कितने फ़लसफ़े बना कर दफ़न कर दिए
कागजों को स्याही भी इमदाद ना हुई
मैं चुप ही रह ली फिर से
उसे लगा मैं बर्बाद ना हुई

तू नाम लिख कर मेरा मिटाएगा ना फिर
फिर उसने देखा कि मुझसे कोई ग़लती आज हुई
फिर मैंने उसे उसकी ख़ता नहीं बतायी
कुछ ऐसे यह बात हुई

मैंने अरमानो के सदके चढ़ाए
वो कहे अहसान मैं में उसकी हुई
मैं शाख़ कर दूँ यह वजूद
वो कहे की यह बात अब आम हुई

मेरा वास्ता ख़्वाबों से पड़ा
की मैं हक़ीक़त में नाकाम हुई
सब कुछ था आँखों के सामने
मोहब्बत में कहाँ कहाँ कैसे कैसे बदनाम हुई ।

पुरानें क़िस्सों की नयी अर्ज़ियाँ

बचपन (Childhood Memoirs)

काफ़ी दिनो से कुछ पोस्ट नहीं किया..काम काज और कुछ अन्य चीज़ों में व्यस्त होना भी अच्छा रहा। कुछ अलग इक्स्पिरीयन्स मिले तो अलग दृष्टिकोण बने। इसलिए कुछ नया करते रहना आवश्यक है। कितना भी व्यस्त हो भावविभोर व्यक्ति भाव के समीप अपने आप को ज़रूर पाता है। अब फिर जब भाव बहे तो शब्दों ने असर दिखाया और कुछ लिख कर बाँटने का मन किया। तो ईद के मौक़े पर सब भाई बहनो से मिलने की ख़ुशी का असर यह कविता है।

सुनती है क्यारियाँ
गलियाँ गलियारे
जो बातें बिन बोले हो जाती थी
पड़ोस के काका की चूरन की गोलियाँ
जो हमने मिलकर बाँटी थी
वो साइकल के लिए लड़ना
और सड़कों पर खेलने की जो आज़ादी थी
वो पतंग उड़ाना
और पड़ौसी की छत पर कुदने
में जो तुम सब थे मेरे साथी
वो माँ बाप की लड़ाइयों में
हमारा हो जाना जज़्बाती
वो सब बातें मुझे याद है
वो जो बचपन के साथ है
जब रक्षा की थी एक दूसरे की
नही कोई मुश्किल हालात थे
आज सुनती हू सब अपनी लड़ाई से जूंझ रहे है
अपनी मंज़िल और रास्ता ढूँढ रहे है
में अपना पता बता रही हूँ
भूली नही हूँ उन गलीयो का रास्ता
जता रही हूँ
अकेले नही हो तुम सब
मंज़िलों की खोज में
मुझे रखना अपनी सोच में
और बाँट लेना हल्के भारी जज़्बात आपस में
मुझमें आज भी कही वो बच्चा है
जो तड़पेगा सुन कर तुम्हारी बात
और यह रिश्ते जो बदले थे
फिर से बदल जाएँगे
बचपन के साथ शायद तो नहीं पाएँगे
मगर जवानी के हालात बाँट पाएँगे । 😇

नये क़िस्सों की पुरानी तर्ज़

राज़ (Secrets of pain in desires)

बोलने से कुछ नहीं बदलता, बस सामने वाले को पता चलता है की आपको चोट कहाँ होती है। एक तरीक़ा यह होगा की हमें चोट हो ही ना, पर अभी तक मैं ऐसा अपने आप को ढाल नहीं पायी हूँ। पर किनारा करना सीख रही हूँ, ऐसी हर चीज़ से जो अहसास हल्के करने की बजाए भारी करे। हर कोई अपनी सोच का ग़ुलाम है शायद मैं भी, पर सोच में किसी को ना शामिल करना नहीं सीखा, ख़याल आ ही जाता है, उसके बाद फिर वही पुराने सिलसिले। इसलिए यह कविता की थोड़े से मगरूर हो जाए, सादगी और साफ़ दिल को बेवक़ूफ़ी और ज़रूरत का भी नाम देते हैं लोग।

मेरे सभी शायर और कवि दोस्तों, संभल कर रहिएगा दिल के मामलो में। गुड लक!

यह राज दिल के बताऊँ क्यूँ मैं
दाग़ ऐसे दिखाऊँ क्यूँ मैं
बहाल दिल को तू छोड़ देगा
ऐसे पिया के पास जाऊँ क्यूँ में

जो वसल पर बात की थी
भूल गया तू दोहराऊँ क्यूँ मैं
दिन अंधेरे गुज़र रहे है
रातों को शमा जलाऊँ क्यूँ मैं

मगरूर हो जा तू बात बात में
मेरी भी मालमत जताऊँ क्यूँ मैं
इल्म मेरे हाल का कौन रखे
मशवरत किसी से पाऊँ क्यूँ मैं

अपने रंज-ऐ-ग़म को क्यूँ मैं छोड़ो
किसी और के वाबस्ता इन्हें बनाऊँ क्यूँ मैं
हमदर्द हमराह हो तो मिलो
मुशीर इश्क़ के नाम घर लाऊँ क्यूँ मैं

मशरूफ है दुनिया के ग़म की ख़ातिर
दिए-तले-अंधेरा उन्हें दिखाऊँ क्यूँ मैं
लगाते है हर शमा पर चिंगारियाँ
बुझी लो को मेरी जलाऊँ क्यूँ मैं

मैं आम हूँ उसकी नज़र में
उन्हें ख़ास फिर पाऊँ क्यूँ मैं
मिले तो ले लें मेरे जैसी कुव्वत
फिर शर्मिंदा होने को किसी को जताऊँ क्यूँ मैं

यह राज दिल के बताऊँ क्यूँ मैं।